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भारत की कंपनियों का समाज-सेवा का पैसा कहाँ जाता है?

हमारे CSR शोध का पाँच मिनट का सार — बिना किसी भारी-भरकम शब्दों के।

CSR क्या है?

2014 से भारत में एक ऐसा कानून है जो दुनिया में सबसे पहले यहीं बना: बड़ी कंपनियों को अपने मुनाफ़े का 2% समाज-सेवा पर खर्च करना अनिवार्य है। स्कूल, अस्पताल, स्वच्छ पानी, कौशल प्रशिक्षण — इसे कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, यानी CSR कहते हैं।

यह मर्ज़ी का दान नहीं, कानून है। और यह अब बड़ी रकम बन चुकी है: पिछले साल अकेले ₹40,794 करोड़। ग्यारह साल में कंपनियों ने लगभग ₹2.88 लाख करोड़ खर्च करने की सूचना दी है।

तो समस्या क्या है?

हमने सरकार का अपना ही डेटा पढ़ा — हर साल, हर राज्य, हर क्षेत्र, ग्यारह वर्षों का। तीन बातें सामने आईं।

1. पैसा वहाँ जाता है जहाँ कारखाने हैं, वहाँ नहीं जहाँ ज़रूरत है।

कानून कहता है कि कंपनियाँ अपने "स्थानीय क्षेत्र" को प्राथमिकता दें। कारखाने अमीर राज्यों में हैं। इसलिए पैसा भी अमीर राज्यों में ही रह जाता है।

इसे ऐसे समझिए: बिहार के एक ग़रीब व्यक्ति के हिस्से में साल भर में लगभग ₹61 आते हैं। गोवा में लगभग ₹64,308। यानी हज़ार गुना ज़्यादा। बिहार में देश के पाँचवें हिस्से के ग़रीब रहते हैं — और उसे इस पैसे का 1% भी नहीं मिलता। सात राज्यों में देश के 61% ग़रीब रहते हैं, और उन्हें मिलता है सिर्फ़ 11% पैसा

यह किसी ने जानबूझकर नहीं किया। पर कोई इसे ठीक भी नहीं कर रहा।

2. हर पाँच में से एक रुपया "पैन इंडिया" में गुम हो जाता है।

हर साल ₹8,100 करोड़ से ज़्यादा ऐसे दर्ज होता है जिसमें राज्य का नाम ही नहीं होता — बस "पैन इंडिया"। हम आपको नहीं बता सकते कि वह पैसा किस गाँव, किस ज़िले, या किस राज्य तक पहुँचा। यह रकम सबसे छोटे 25 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को मिलने वाली कुल राशि से भी ज़्यादा है।

3. हम खर्च गिनते हैं। बदलाव कभी नहीं गिनते।

ग्यारह साल की रिपोर्टें। पर एक भी कॉलम नहीं जो बताए: कितने बच्चों ने पढ़ना सीखा, कितने मरीज़ों का इलाज हुआ, कितने कुएँ आज भी चल रहे हैं। हमें पता है कि रुपये गए। यह नहीं पता कि उनसे कुछ बदला या नहीं।

आपको अभी क्यों परवाह करनी चाहिए?

क्योंकि संसद इसी महीने इस पर फ़ैसला कर रही है। सांसदों की एक संयुक्त समिति इस कानून में बदलावों की समीक्षा कर रही है और इसी सत्र में अपनी रिपोर्ट देगी। जो बदलाव मेज़ पर है, वह मुख्यतः यह तय करता है कि कौन-सी कंपनियाँ खर्च करें। यह अभी तक यह नहीं छूता कि पैसा कहाँ जाए, या उससे कुछ हुआ या नहीं

2021 के बाद इस कानून को बदलने का यह पहला मौका है। 2029 से पहले शायद आख़िरी भी।

हमने संसद से क्या कहा है

हमने समिति को औपचारिक ज्ञापन भेजा है, जिसमें तीन सीधे सुझाव हैं:

  1. ज़्यादा कंपनियाँ दायरे में रहें, पर कागज़ी काम कम हो — दायरा छोटा न करें, प्रक्रिया आसान करें।
  2. जहाँ ज़रूरत है वहाँ उचित हिस्सा भेजें — चरणबद्ध तरीके से, चौथाई पैसा सबसे पिछड़े ज़िलों, पूर्वोत्तर, और पहाड़ी व द्वीप क्षेत्रों तक पहुँचे।
  3. हर रुपया ट्रेस हो सके — ज़िले का नाम दर्ज हो, और सिर्फ़ रकम नहीं, परिणाम भी बताया जाए।

आप क्या कर सकते हैं?


इनमें से कुछ करना चाहते हैं? कार्रवाई पन्ने पर जाइए → — सांसद को भेजने लायक तैयार पत्र, ज़िले के लिए सवाल, और साझा करने लायक आँकड़े।

यहाँ सब कुछ सरकार के अपने CSR पोर्टल (11 साल का डेटा) और नीति आयोग के ग़रीबी सूचकांक से लिया गया है, और स्वतंत्र रूप से जाँचा गया है। साझा करने और दोबारा इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र — CC-BY-SA.