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तीन काम जो आप कर सकते हैं
हमने पाया कि भारत का कॉर्पोरेट समाज-सेवा खर्च ज़्यादातर उन जगहों तक नहीं पहुँचता जहाँ सबसे ज़्यादा ज़रूरत है — और संसद इसी समय इस कानून की समीक्षा कर रही है। नीचे तीन तैयार तरीके हैं। कॉपी कीजिए, कोष्ठक वाले हिस्से भरिए, भेज दीजिए।
पहली बार आए हैं? पाँच मिनट की गाइड से शुरू कीजिए।
पहला काम · 2 मिनट
अपने सांसद या विधायक को लिखिए
जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र के लोगों की चिट्ठियों पर उम्मीद से ज़्यादा ध्यान देते हैं — खासकर जब उनमें ठोस आँकड़े और एक साफ़ माँग हो।
विषय: CSR का पैसा और हमारा ज़िला — एक निवेदन
महोदय/महोदया,
मैं [आपका शहर/ज़िला] का निवासी हूँ। मैं कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के अंतर्गत कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) खर्च के बारे में लिख रहा/रही हूँ, जो इस समय कॉर्पोरेट विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 के अंतर्गत एक संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष है।
सरकार के अपने राष्ट्रीय CSR पोर्टल के आँकड़ों (वित्त वर्ष 2014-15 से 2024-25) के विश्लेषण से पता चलता है कि CSR का पैसा मुख्यतः उन राज्यों में जाता है जहाँ कंपनियाँ काम करती हैं, न कि वहाँ जहाँ ज़रूरत सबसे ज़्यादा है। देश के लगभग 61% बहुआयामी ग़रीब सात राज्यों में रहते हैं, जिन्हें राज्यवार दर्ज CSR का लगभग 11% ही मिलता है। बिहार में यह प्रति ग़रीब व्यक्ति लगभग ₹61 प्रति वर्ष बैठता है, जबकि गोवा में लगभग ₹64,308।
मेरा निवेदन है कि आप विधेयक में इन तीन बदलावों का समर्थन करने पर विचार करें:
1. CSR का दायरा व्यापक बना रहे — छोटी कंपनियों को छूट देने के बजाय अनुपालन आसान किया जाए।
2. धारा 135(5) में चरणबद्ध भौगोलिक-समता का प्रावधान जोड़ा जाए, ताकि CSR का एक न्यूनतम हिस्सा आकांक्षी ज़िलों और प्रखंडों, पूर्वोत्तर राज्यों, तथा हिमालयी एवं द्वीपीय क्षेत्रों तक पहुँचे।
3. फ़ॉर्म CSR-2 में ज़िला-स्तरीय और परिणाम-आधारित रिपोर्टिंग अनिवार्य की जाए, ताकि नागरिक देख सकें कि पैसा कहाँ गया और उससे क्या हुआ।
पूरा विश्लेषण, आँकड़े और तरीका https://lofl.world/reports पर खुले रूप में उपलब्ध है।
आपके विचार जानकर मुझे प्रसन्नता होगी।
सादर,
[आपका नाम]
[आपका पता / निर्वाचन क्षेत्र]
दूसरा काम · 5 मिनट
पूछिए कि आपके ज़िले में CSR से क्या हुआ
ज़िला-स्तर का CSR डेटा कहीं प्रकाशित नहीं होता। यही तो पूरी समस्या है — और पूछने से ही यह खाई भरती है। इसे अपने ज़िलाधिकारी या ज़िला परिषद के CEO को डाक या ईमेल से भेजिए। ₹10 शुल्क के साथ RTI के रूप में भी दाख़िल कर सकते हैं।
सेवा में,
ज़िलाधिकारी / मुख्य कार्यकारी अधिकारी, ज़िला परिषद,
[आपका ज़िला]
विषय: ज़िले में CSR-वित्तपोषित कार्यों की जानकारी
महोदय/महोदया,
मैं इस ज़िले में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) से जुड़ी निम्नलिखित जानकारी चाहता/चाहती हूँ:
1. पिछले तीन वित्तीय वर्षों में इस ज़िले में लागू सभी CSR-वित्तपोषित परियोजनाओं की सूची, प्रत्येक के लिए योगदान देने वाली कंपनी का नाम और राशि सहित।
2. प्रत्येक परियोजना किस विकास क्षेत्र (कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची VII के अनुसार) में वर्गीकृत की गई।
3. प्रत्येक परियोजना के लिए दर्ज परिणाम — जैसे लाभार्थियों की संख्या, बनाई गई परिसंपत्तियाँ, या दी गई सेवाएँ — और वह कार्यालय जिसके पास यह अभिलेख है।
4. इस ज़िले में CSR गतिविधियों के समन्वय के लिए उत्तरदायी अधिकारी या विभाग का नाम।
मैं इस ज़िले का निवासी हूँ और यह जानकारी जनहित में माँग रहा/रही हूँ।
सादर,
[आपका नाम]
[पता] [दिनांक]
जवाब मिला? उसे यहाँ दर्ज कीजिए — हम इन जवाबों को एक खुले रिकॉर्ड में इकट्ठा कर रहे हैं, ताकि जो ज़िला-स्तरीय डेटा भारत प्रकाशित नहीं करता, वह नीचे से बनना शुरू हो।
तीसरा काम · 30 सेकंड
यह आँकड़ा साझा कीजिए
₹61 बनाम ₹64,308 — यह तुलना ज़्यादातर लोगों ने, यहाँ तक कि ज़्यादातर सांसदों ने भी, कभी नहीं देखी।
भारत की कंपनियों को अपने मुनाफ़े का 2% समाज-सेवा पर खर्च करना होता है — पिछले साल ₹40,794 करोड़।
पर बिहार के एक ग़रीब व्यक्ति के हिस्से में साल भर में लगभग ₹61 आते हैं। गोवा में लगभग ₹64,308। हज़ार गुना ज़्यादा।
देश के 61% ग़रीब उन 7 राज्यों में रहते हैं जिन्हें 11% पैसा मिलता है। और हर साल ₹8,100 करोड़ सिर्फ़ "पैन इंडिया" लिखकर दर्ज होता है — न राज्य, न ज़िला।
संसद इस कानून की समीक्षा अभी कर रही है।
पूरा डेटा और तरीका (सरकार के अपने पोर्टल से): https://lofl.world/reports
यह सब सरकार के अपने प्रकाशित आँकड़ों से बना है। तरीका और डेटासेट: हम रिपोर्ट कैसे बनाते हैं · सभी रिपोर्टें. दोबारा इस्तेमाल के लिए स्वतंत्र — CC-BY-SA.